बिना विभागीय जांच सेवा से हटाना गलत, हाईकोर्ट का फैसला; जेल प्रहरी को मिला न्याय

 बिना विभागीय जांच सेवा से हटाना गलत, हाईकोर्ट का फैसला; जेल प्रहरी को मिला न्याय


बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि बिना विभागीय जांच किसी भी कर्मचारी को सेवा से पृथक नहीं किया जा सकता और उसे सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।


मामला जेल प्रहरी उमराव सिंह ठाकुर से जुड़ा है, जिनकी भर्ती वर्ष 2009 में हुई थी। सेवा के दौरान उन्होंने समय-समय पर अवकाश स्वीकृत कराकर पारिवारिक कारणों से समय बिताया। अवकाश के दौरान विलंब से ड्यूटी पर लौटने पर विभाग ने उन्हें आमद नहीं दी और बिना विभागीय जांच किए वर्ष 2018 में सेवा से हटा दिया।

इसके खिलाफ उमराव सिंह ठाकुर ने अपने अधिवक्ता रवि भगत के माध्यम से वर्ष 2019 में उच्च न्यायालय में याचिका (WPS 10147/2019) दायर की। मामले की सुनवाई लगभग 7 वर्षों तक चली, जिसके बाद 7 अगस्त 2025 को न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश पारित किया।

आदेश के पालन में 19 अगस्त 2025 को ठाकुर ने केंद्रीय जेल अधीक्षक अंबिकापुर के समक्ष उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन उन्हें सेवा में बहाल नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने अवमानना याचिका दायर की। इस बीच शासन द्वारा भी रिट अपील प्रस्तुत की गई।

मामले की अंतिम सुनवाई 17 मार्च 2026 को मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच में हुई, जहां न्यायालय ने शासन की अपील खारिज कर दी। इस फैसले के साथ ही लगभग 7 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे उमराव सिंह ठाकुर को आखिरकार जीत मिल गई।

यह फैसला कर्मचारियों के अधिकारों के संरक्षण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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